Bhagawat Geeta Chapter-15| Gita in hindi
भागवत गीता का पन्द्रहवां अध्याय श्री भगवान बोले-संसार अश्वस्थ (पीपल) के सामान है जिस की पुराण पुरुष जड़ ऊपर है और चराचर शाखा निचे है वेद इसके पते है, जो यह जानता है वही वेद का ज्ञाता है| इसकी शाखाएं ऊपर निचे फैली हुई है, सत्व, रज और तम गुण इसकी रस वाहिनी नसें जिनसे पालन होता है शब्द रूप इसकी डालियाँ है पीछे कर्म रूप में प्रकट होने वाली इसकी जड़े निचे मनुष्य लोक में और भी निचे तक चली गई है| पर अश्वस्थ का यह रूप इसका आदि अंत और आकार संसारी प्राणी के ध्यान में नहीं आता तथा इसकी जड़ गहरी है ऐसे इस पीपल को वैराग्य रूपी दृढ़ शास्त्र से काटकर| वह स्थान ढूंढ़ना चाहिए जहां से फिर लौटना नहीं पड़ता और साथ ही वह विचारना चाहिए की जिसमे वह पुरातन प्रवृति उत्पन्न हुई है| उसी आदि पुरुष की शरण हूँ| अहंकार और मोह रहित संग दोष को जितने वाले आत्मज्ञान से निरत, सब कामनाओं से दूर सुख दुःख नामक दृन्द पदार्थ से मुक्त ऐसे ज्ञानी पुरुष शाश्वत पद को पाते है| जिसे सूर्य, चंद्र, या अग्नि प्रकशित नहीं करते वही मेरा परमधाम है, वहां जाकर लौटना नहीं होता| मेरा सन्तान अंश जोवलोक में जिव का रूप घर कर प्रकृति में सिथ...